Monday, August 8, 2016

कहानी - दिए जगमगा उठे



                              दिए जगमगा उठे     
आज पुरे चार साल बाद अपने मायके जा रही हूँ  .घर और पापा की कुछ एक बची ज़मीन की रजिस्ट्री करने ,मम्मी को दुनिया
 से  गए चार साल होगये और पापा को ६ साल ,जाने कैसे वक्त गुज़र जाता है पता ही नहीं चलता  कितनी ज़िम्मेदारी होती है इकलौती होने की ,एकसाथ दो परिवार को देखना आसान नहीं होता  वो विनीत जैसे  पति भी किस्मत से मिलते है जो हर मुश्किल मै मेरा साथ बखूबी निभाते है अकलतरा से मेरा नाता पूरी तरह छुट जायेगा सोच आँखे बरबस ही भर आई  । बचपन की यादे चलचित्र की तरह मेरे आँखों मै दिखलाई देने लगी पापा का दुलार , माँ की स्नेह की छाया में बचपन से कब जवानी की दहलीज में कदम रखी पता ही  नहीं चला पापा का अपना व्यवसाय  था ढेर सारे नौकर, शहर में प्रतिष्ठा और लोगो  के बीच सम्मान उन्हें विशिष्ट बनाता था सोच ही रही थी तो घर के दरवाजे पर जाकर  तन्द्रा भंग हुयी इतनी जल्दी घर भी आ गया मै अपनी ३ महीने की बिटिया को विनीत की गोद में दे कर  उतरी एक ठंडी बयार ने बगीचे के पेड़ो को हिला कर मेरा अभिवादन किया घर का चोकीदार दरवाजा खोला तो पाँव अपने आप मेरे कमरे की ओर बढ़ चले मेरी अलमारी मेरे खिलोने मेरी पलंग यथास्थिति रखी थी अचानक चौकीदार ने कहा बेबी चाय चाय का कप हाथ में ली तो बचपन में दूध पीने  के लिए करने वाले नखरे की याद आ गयी कैसे गुस्सा हुआ करती थी  मै दूध पीने के नाम पर ,मम्मी तो एकदम तंग आ जाती थी वो तो सुखिया बाई थी जो कहाँ कहाँ से कहानियां सुना कर पूरा दूध पिला दिया करती थी .विनीत बाहर बैठक में रजिस्ट्री का काम कर रहे थे जिन्हें ये मकान लेना था वे इसे तोड़ दूसरी तरह बनवाना चाहते थे मन कर रहा था जी भर के आखिरी बार इसे निहार लूँ फिर इस जनम में इसे दुबारा नहीं देख पाऊँगी . मैंने अपने पुराने खिलोने अपने बेग में भरे और आँखे नम हो आई कितनी यादे जुडी थी इन खिलौनों  से , ये चाबी  वाला बन्दर पापा ने मुझे जन्मदिन पर दिया था और पप्पी  देतेहुये कहा  ये मेरी प्यारी बंदरिया के लिए ,मै ख़ुशी से झूम उठी थी बाद में  इसकी चाबी ख़राब हो गयी थी तो में सुखिया बाई को तंग करते हुए कहती इसे नचाओ न सुखिया बाई ,वो बोलती ख़राब हो गया है बिटिया तो में फिर जिद करती क्यों हो गया ठीक करो ,वो मुस्कुरा के कहती बेबी एक दिन सब ख़राब  हो जाते है  ये हाथ पैर भी काम करना बंद कर देंगे में कहती ऐसा नहीं होगा मै सब ठीक कर दूंगी तो वो हंस पड़ती , मै सोच ही रही थी विनीत ने आवाज़ लगायी चलो विभा काम ख़त्म हुआ अब चलते है मै भारी  मन से अपने कमरे से निकल पड़ी बहार निकल कर चौकीदार से पूछा सुखिया बाई आज कल कहाँ है राम दिन पास ही मै उसका घर है बेबी ,आजकल ज्यादा काम धाम नहीं कर पाती अपने घर में  ही रहती है उसने कहा .सुखिया बाई के अपने बाल -बच्चे नहीं थे पति बहुत पहले ही गुज़र गया था दूर के रिश्ते का एक भतीजा था जिसके बारे में वो अक्सर बताया करती थी चलो सुखिया बाई से भी मिल आते है मेने विनीत से कहा तो उन्होंने सर हिलाकर अपनी सहमती दे दी ,कुछ ही देर में हम सुखिया बाई के घर पहुँच गए सुखिया बाई पहचान में ही नहीं आ रही थी शरीर जर्जर हो चूका था मगर मुझे देखते ही वो अपने टूटे पलंग से उठते हुए मुस्कराते हुए  बोली अरे बिटिया कब आई . मैंने कहा कैसी हो सुखिया बाई उसे देखकर आंखे नम हो आई हम एकदम बढ़िया बिटिया ये हमारी दुलारी है न मेरी बिटिया को गोद में लेतेहुये उसने पूछा" हाँ "मेने कहा फिर वो डगमगाते हुए अपने पलंग के पास गयी और तकिये के नीचे से मुड़ा-तुड़ा २० रुपये का नोट  निकाला और मेरी बिटिया को पकड़ते हुए बोली अखिया तरस गयी थी बिटिया इसे देखने के लिए हम सोचत रहीं की क्या पता अब देख भी पाएंगे के  नहीं ,मन एकदम भर आया था इतना प्यार इतनी श्रद्धाक्या कभी चूका पाऊँगी तुम्हारा भतीजा कहाँ है सुखिया बाई मैने पूछा विहाव हो गया है उसका अपनी पत्नी के साथ रहता है अहि शहर में तो तुम क्यों नहीं रहती उसके साथ मैने पूछा हमर बहु को ये पसंद नहीं है बिटिया ,हम अपना ये घर उनके नाम कर दियो है का जानो कब तक ये शरीर साथ दे .उसी क्षण मन ने कुछ संकल्प लिया . मैने कहा ---मै तुम्हे लेने आई हूँ सुखिया बाई उठो तेयार होवो तुम्हारी बिटिया के साथ जाने के लिए ,कहाँ बेबी सुखिया बाई ने आश्चर्य से पूछा , मेरे साथ मेरे घर मैने कहा नहीं बिटिया हम यहीं ठीक है सुखिया बाई बिटिया मानती हो तो चलना होगा मेरे साथ वर्ना गुडिया को दिए ये पैसे वापस कर दूंगी ,सुखिया बाई डगमगाते हुए उठी  और अपनी गठरी बाँधने लगी मैने विनीत की और देखा वे मुस्कुराते हुए अपनी सहमती दे रहे थे और इधर सुखिया बाई की आँखों मै उम्मीद के हजारो दिए जगमगा उठे थे .
                                                            सुजाता शुक्ला
                             

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