Monday, September 5, 2016

मेरी प्रथम गुरु मेरी माँ


माँ तुमसे जीवन को मेरे निश्छल निर्मल सा प्यार मिला
तुमसे मेरे रूप प्रतिरूप को एक नया श्र्रूंगार मिला
आशा से परिपूरित मन मे तुम्हारी अनुपम छवि है
माँ पर कौन लिख सका बेटा बेटी या कवि है
मेरी एक एक श्वास पर हर अहसास तुम्हारा है
सुरभित चन्दन सी अनुभूति पावन सौगात तुम्हारा है
व्याकुल मन के नीरस पतझड़ पर बसंत बहार तुम हो
बिखरते रिश्तो के बीच कड़ी का एक वरदान तुम हो
जाने कैसे व्यथा मे भी मुस्कुरा लेती हो तुम
संताप छुपा के आँचल मे गम सहती चुप रहती हो तुम
सीखा है तुमसे हमने विपदाओं मे भी हँसना
तपते संघर्षमय जीवन मे शीतल बूंदों सा बरसना
कितना कुछ है तुममे जो आत्मसात करना है
तुम्हारे आदर्शो को ग्रहण कर इस जीवन से तरना है
सुजाता शुक्ला

Tuesday, August 30, 2016

नमन

भक्ति इतनी दीजिये , रोज़ गुरुवर  ध्याऊँ
दिवस जगुँ या रात जगुँ तुझको ही मै पाऊँ 

Monday, August 22, 2016

खौफ नही अब किसी से, बहुत से मंज़र हमने देखे
जो करीब था दिल के उसको लिये हाथ मे खंजर देखे........ सुजाता

Wednesday, August 17, 2016


रक्षाबन्धन



आओ मेरे भाईयो स्नेह सुत्र का गहना दूँ 
आज तुम्हारी कलाई पर राखी मै पहना दूँ 
करूँ  कामना ईश्वर से तुम्हारी उन्नति का
बन्धन है अपना ये पिछली कई सदी का...........सुजाता शुक्ला

Monday, August 15, 2016



मन्दिर हो की मस्जिद हो, गिरिजा हो की गुरुद्वारा
मुझे है प्यार वतन से , सभी कुछ है मुझे प्यारा
रखना दूर मुझको तुम , इन जात पात की दिवारो से
देश के लिये स्वीकार है ,  सदैव चलना अंगारो से
बनी हूँ  इस मिट्टी से ,इसी मे मिल जाउंगी एक दिन
चाह यही रखती हूँ  हरपल यही हो जन्म मेरा दुबारा
                                     सुजाता 

मेरा भारत


Friday, August 12, 2016

ईश्वर



   
मै ज्ञान हूँ  सम्मान हूँ 
इस धरा का मान हूँ 
मै चर हूँ  अचर भी मै
मै ही अंतरध्यान हूँ 
मै भाव मे प्रभाव मे
मै शांत चित्त ठहराव हूँ 
अंगीकार कर ले मुझे
मै तुझमे विद्यमान हूँ ..... सुजाता

Thursday, August 11, 2016

उम्मीद



न उम्मीद छोड न मुख को मोड
राह  से अपना रिश्ता  जोड
न थक के हार चुनौती स्वीकार
न मिलेगा ये जीवन बार बार
        सुजाता शुक्ला                                                                                                                                                                         

Wednesday, August 10, 2016

विरह व्यथित उर्मिला



            
हे नृपपुत्र ,हे राजकुमार, तुम समर्पित थे भाई के प्रेम मे ,
तुम्हे उनके दर्द का इतना अहसास था कि क्रोधित हो उठे थे ये जानकर,
कि माता कैकई ने ,भ्राता को चौदह वर्ष का वनवास दिया
तुम्हारे रोम रोम कांप उठे थे, बदन थरथरा गया था ,आंखो से ज्वाला प्रज्जवलित हो रही थी
तुम्हारे लिये, ये अकल्पनीय था तुम्हारे लिये ही क्यो, सम्पूर्ण अयोध्या के लिये भी,
सभी अचक भौचक रह गये थे, एक सन्नाटा सा पसर गया था दूर दूर तक
तभी तुमने घोषणा कर दी कि भ्राता श्री के साथ तुम जाओगे, उनकी सेवा के लिये
मै दरवाजे की ओट से तुम्हे देख रही थी सोच रही थी कि अभी कहोगे कि मेरे संग मेरी उर्मिला भी जायेगी परंतु तुमने तो कुछ नही कहा, तुम भ्राता के प्रेम से अभिभुत थे और मुझे जाते जाते कह गये इन सब को तुम्हारे भरोसे छोड के जा रहा हुँ  उर्मिला, इनका ध्यान रखना, ये सब तो मेरे भरोसे थे और मुझे किसके भरोसे छोडा था ....  ?     बोलो ना स्वामी.  ........... सुजाता शुक्ला