हे नृपपुत्र ,हे राजकुमार, तुम
समर्पित थे भाई के प्रेम मे ,
तुम्हे उनके दर्द का इतना
अहसास था कि क्रोधित हो उठे थे ये जानकर,
कि माता कैकई ने ,भ्राता को
चौदह वर्ष का वनवास दिया
तुम्हारे रोम रोम कांप उठे
थे, बदन थरथरा गया था ,आंखो से ज्वाला प्रज्जवलित हो रही थी
तुम्हारे लिये, ये अकल्पनीय
था तुम्हारे लिये ही क्यो, सम्पूर्ण अयोध्या के लिये भी,
सभी अचक भौचक रह गये थे, एक
सन्नाटा सा पसर गया था दूर दूर तक
तभी तुमने घोषणा कर दी कि
भ्राता श्री के साथ तुम जाओगे, उनकी सेवा के लिये
मै दरवाजे की ओट से तुम्हे
देख रही थी सोच रही थी कि अभी कहोगे कि मेरे संग मेरी उर्मिला भी जायेगी परंतु
तुमने तो कुछ नही कहा, तुम भ्राता के प्रेम से अभिभुत थे और मुझे जाते जाते कह गये
इन सब को तुम्हारे भरोसे छोड के जा रहा हुँ उर्मिला, इनका ध्यान रखना, ये सब तो
मेरे भरोसे थे और मुझे किसके भरोसे छोडा था .... ?
बोलो ना स्वामी. ........... सुजाता शुक्ला
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