कभी कभी अच्छा लगता है
सुबह सुबह अपने आंगन मे
फुदकती चिडियो को देखना
दिन भर के काम के बाद फुरसत
के पल तलाशना
एकांत मे बैठ किसी कमरे मे
चुपचाप अपनी पसन्द की पुस्तक पढना
मन के तानेबाने गुथ कोई
कहानी गढना कभी कभी अच्छा लगता है
दूर आसमान को तकना , कोई
नयी चीज़ चखना
पुरानी तस्वीरो को सलीके से
रखना
यादो के बीच भंवर से किसी
की स्मुति सहेजना
किसी नये इंसान की खुबी
परखना कभी कभी अच्छा लगता है
बेवजह गुनगुनाना, हंसना और
मुस्कुराना
किसी पुराने मित्र से मिलकर
ढेरो बतियाना
अपनी आपबीती सुनाना, उसकी
आपबीती सुन खिलखिलाना
चुपके से बनाना कोई बहाना
कभी कभी अच्छा लगता है
किसी की गलतियो को जानकर भी
नज़रअन्दाज़ करना
अंतस मे छुपे ज़खमो को
चुपचाप भरना
लाखो की भीड मे भी अकेले
चलना
चोट खाने के बाद खुदबखुद
सम्भलना कभी कभी अच्छा लगता है….
सुजाता शुक्ला
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