मन्दिर हो की मस्जिद हो,
गिरिजा हो की गुरुद्वारा
मुझे है प्यार वतन से , सभी
कुछ है मुझे प्यारा
रखना दूर मुझको तुम , इन जात पात
की दिवारो से
देश के लिये स्वीकार है , सदैव
चलना अंगारो से
बनी हूँ इस मिट्टी से ,इसी मे
मिल जाउंगी एक दिन
चाह यही रखती हूँ हरपल यही
हो जन्म मेरा दुबारा
सुजाता
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