मनन
गौरवर्ण बन इतराती है धुप गुनगुनी भोर की
गौरवर्ण बन इतराती है धुप गुनगुनी भोर की
चहचहाहट हल्लागुल्ला शामत
आती चोर की
मुक्का लात और घुंसा आदत ये कठोर की
थक हार कर चुप रहना निशानी
है कमज़ोर की
दियाबाती तुलसी चौरा मंज़िल
है उस डोर की
भर दे सबकी झोली, क्या बात
उस चितचोर की
आल्हादित हो झुम रहा खासियत
ये मोर की
प्यासा बैठा स्वाति जल बिन
है कहानी चकोर की
झुमे डाली वन उपवन सारे, छटा
देख घटोप की
पवन संग धरती झुमी मस्ती
घटा घनघोर की.
..... सुजाता शुक्ला
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