विचारों के समंदर मे डूबते उतरते न जाने कभी कभी हम कहाँ पहुँच जाते है जिसमे बेसिरपैर की ढेरों बातें होती है वास्तविक जीवन से उसका कोई सारोकार नहीं होता पर भावनाएं तो अविरल ही बहती हैं न ,बिना कुछ कहे , बिनकुछ सोचे ,अनायास कभी पलकें भीगा जाती हैं तो कभी अज्ञात वास की तरह एक कोने मे बैठ दुबक जाती है अवश से हम इसके मोहपाश मे खींचे चले जाते हैं बेसुध से -----
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